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Thursday, July 31, 2014

एक वज़ूद मेरा भी है

मैं  घर से आ रहा था, ट्रैन २० मिनट तक कानपुर के रेलवे स्टेशन पे रुकी रही और वहा मैंने २ कवितायेँ लिखी ये उनमे से एक है. कानपूर जहां मुझे किसी को देखकर ये एहसास हुआ की एक वज़ूद मेरा भी है. मुझे भी हक़ है अपनी पसंद रखने का अपने शौक रखने का. मैंने आखिरी ६ महीनो में कोई कविता नही लिखी, कुछ लिखा ही नहीं जा रहा था. लेकिन जब कानपूर के स्टेशन पे ट्रेन रुकी तो लगा की जैसे कुछ मै  उन्ही पिछले दिनों में आ गया हूँ , मुझे लगा मैं यह से अभी जाऊंगा रावतपुर के ऑटो पकडूँगा और फिर से किसी न किसी कोचिंग में वो नजर आएगी मुस्कुराती हुयी। या फिर अनीश की कोचिंग के बाहर  ऑटो काइंतजार करती हुयी, मैं  फिर से अपनी PG की बॉलकनी से उसे देखूंगा या फिर क्लास में उसके पीछे बैठने की कोशिश करूंगा, फिर लिखा मैंने। मेरी दूसरी कविता जिंदगी के ऊपर है, मैंने उसमे दिखाया है की कैसे मैं बस कुछ कदम चला था जिंदगी के साथ और काफी दूर निकल आया.

"शायद कभी कभी जिंदगी कुछ दायरों में दफन  रहना पसंद करती है और इंसान उससे ताउम्र बाहर नही निकल पाता"  :) 

और शायद इन्ही दायरों में इंसान बहुत कुछ सिखता है जो सीख उसके साथ हमेशा रहती है.


फिर वही लौट कर आया आया हूँ मै
जहा तूने अहसास दिलाया था
एक  वज़ूद मेरा भी है
तुझसे मुहब्बत कर बैठा 
और अब तक समझ नहीं पाया 
की गलती सिर्फ मेरी है 
या कुछ कसूर तेरा भी है 

फिर से रौद कर  आया हूँ 'वो रास्तें'
जहा तेरी सूरत मेरा इत्मिनान हुआ करती थी
तुझे देख कर समझा की 
"जिंदगी" जैसा एक सफर मेरा भी है 

अब भी खामोश हूँ मै  वहा
जहा  तेरी मुस्कुराहटें
मेरी खुशियों का आगाज़ हुआ करती थी
तुझे चहकते देख कर दोस्तों के साथ 
सोचताहूँ तुझसे बात करने का हक़ तो मेरा भी है 

अब भी उलझा है दिल उन गलियों से
जहा तेरे कदमो के निशान मेरी पहचान हुआ करते थे
फिर से उन्ही कतरो  की रौशनी से देख रहा हूँ 
तेरी आने की हर आहट  के पीछे 
एक निशा मेरा भी है 

फिर वही लौट कर आया हुँ मै
जहा तेरी नफरत भी मेरी अमानत हुआ करती थी
कभी कभी बेबस महसूस करता हूँ
और ये सोच कर मुस्कुरा उठता हूँ मैं 
की नफरत का ही सही 
तेरे दिल में एक ख्याल मेरा भी है 

                                                                                  -रोशन 





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जिंदगी से मैंने कभी कुछ माँगा तो नहीं

This piece of writing is penned by my cousin sister. She is a student of 12th class. Her name is Shivangi Shingh Yadav. She asked me if i can put it on my blog. so here it is little sister.



जिंदगी से मैंने कभी कुछ माँगा  तो नहीं 
पर जो मिला मांगे ना मिलता 
जो लम्हे जिंदगी ने दियें भुलाये न भूलेंगे 
वो हमेशा साथ रहेंगे 

जिंदगी से मैंने कभी कुछ माँगा  तो नहीं 
बिन मांगे बहुत  कुछ  मिल गया मुझे 
पर हमें क्या पता था ये सब पल भर के है 
जो जिंदगी ने कभी दिए थे मुझे 

जिंदगी से मैंने कभी कुछ माँगा  तो नहीं 
कुछ ख्वाहिशें बिन मांगे ही पूरी कर ली 
क्या पता था की कुछ ख्वाहिशें सपने बनकर रह जाएँगी 
वो जो मैंने कभी चाहे थे 

जिंदगी से मैंने कभी कुछ माँगा  तो नहीं 
तकलीफ इस बात की नहीं है,
तकलीफ इस बात से है की 
जो दिया वो छीन गया 
पर मै अब भी निराश नही 

जिंदगी से मैंने कभी कुछ माँगा  तो नहीं 
जो मिला उससे खुश हूँ मै 
क्यों की मालूम है मुझे 
की हर किसी को मुक्कमल जहां नहीं मिलता 
पर इक तरह से देखूं तो मुझे वो भी मिल गया 

जिंदगी से मैंने कभी कुछ माँगा  तो नहीं 
बस अपनी ही अमानत खोते हुये देखा है 
कभी जिंदगी ने रहम न दिखाया मुझपर 
क्यों की जिंदगी से मैंने कुछ माँगा  तो नहीं 
                                -शिवांगी सिंह यादव 



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Saturday, July 12, 2014

Alibi : My defence for innocence official release pictures



Date :14th april 2014
Venue : Chancellors office































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