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Tuesday, December 4, 2012

“इक आहट की तपिश”




कोईआहट चुभतीं हैं तो 
समझ जाता हूँ की ये याद तेरी हैं ।
कोई हैरत मेरे अनछुवे पहलू से गुज़रें 
तो समझ जाता हूँ ये याद तेरी हैं ।

सिद्दत ले पैमानों में बेरंग दिखती हैं,
अब हर बूँद शराब की ।
महकशी  की जद के पार ,
कोई चेहरा दिख जायें तो,
समझ जाता हूँ की ये याद तेरी हैं ।

एक अदृश्य धूआँ सा रहती हैं तू मुझमें,
बस पलकों में कोई सवाल छलक आयें,
तो समझ जाता हूँ कि,  ये याद तेरी हैं ।

शाम-ए-ख़ामोश में  चलते-चलते
ढलने कि अदा सीख ही जायेंगे,
जब भटकती राह में क़दम ठहर जाए तो,
समझ जाता हूँ कि, ये याद तेरी हैं ।

हा, इस दिल में धड़कतीं हर बात तेरी हैं 
जो कभी मेरे ज़ख़्मों से गुज़रों तुम भूलकर 
यहाँ की राह से गुज़रीं, हर याद तेरी हैं ।


मुझे ज़रूरत सी थीं तेरे इकरार-ए-इश्क़ की,
 उन लम्हो में, 
डूबती आँखों की स्याही से लिखीं हर बात तेरी हैं ।
मेरे होंटों पे सिलीं हर आवाज़ तेरी हैं ।
धड़कनों से गुज़रतीं हर बात तेरी हैं ।
इस रूह में धड़कती हर बात तेरी हैं ।

हर ख़ुशबू जला दी एक मलाल की मानिंद,
तेरी राह से गुज़र जाने को 
जल रही हर शाम मेरी हैं ।
मेरे दिल में नफ़रत से मुहब्बत की 
हर कयवाद तेरी हैं ।

कोई अधूरा ख़्वाब देखूँ तो 
तेरी हर बात याद आती हैं ।
इक शिकायत सी मुझमें ठहर जाती हैं ।
हाँ, इस रूह में धड़कती हर आवाज़ तेरी हैं ।


- रोशन यादव





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