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Wednesday, February 14, 2018

एक नाव





फ़ासलो को तय करते हुए
राही गुज़र गया 
कल कोई और शहर था,
अब कोई और शहर हैं,
कल कोई और शहर होगा 

इश्क़ तेरी उस गली से
मेरी उम्मीदों  का शहर गुज़र गया 
और हासिल इतना हैंकि
किताबें भर दी हैं 

एक मेरी नाँव हैं जिसे 
समन्दर से मुहब्बत है,
और भी एक नाँव है,
पास के भवर में ही फँसी पड़ी है
दिल चाहता हैं,  जोखिम उठा कर 
संभाल लू उसको 
लेकिन अब सिर्फ़ ऐसे ही डूबते लोगों से,
मेरा दिलबिना मेरी इजाज़त के 
जुड़ जाता है। 

मैं उसे देख रहा हूँ
ज़िंदगी और जुनूँ से भरी हुई 
उसकी कोशिशें
उसकी मुश्किल बढ़ा रही हैं।

मेरी उलझन अब बढ़ती जा रही हैं।
उसे नफ़रत हैं मुझसे क्योंकि
बस उसे देख रहा हूँ मै 
बस अपनी ख़ातिर सोच रहा हूँ मैं 

कूद पड़ता हूँ फिर मै,
उसकी नाँव तक जाने को
उसे भँवर से दूर लाने को,
ऐसे चेहरे की उदासी देखकर 
क्यूँ ना मेरा दिल टुकड़ों में बिखर जाए
एक बार सहारा क्या लिया उसने
अब डर हैं कल उसकी कमी खलेगी
वो तो बस किनारे तक साथ चलेगी 

बस उसे बाँहों में भरकर समझाता हूँ।
तू डर मत तुझे सुरक्षित किनारे तक 
पहुँचा दूँगा  सही दिशा बता दूँगा 
फिर तू अपनी राह चली जाना 
मन में बोला “मेरे ख़्वाबों में भी ना आना

उसे किनारे तक ले आता हूँ,
फिर एक राह उसे ले जाती हैं।
मैं फिर से तनहा रह जाता हूँ 

फिर फ़ासलो को तय करते हुए
वो राही गुज़र गया 

-रोशन कुमार “राही