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Saturday, February 10, 2018

चाँद की चाह में - “भाग - २”



जल गया था, एक रात, मैं,
चाँद की रौशनी में,
वो ख़ूबसूरत उजाली रात थी,
चाँदनी मुहब्बत बरसा रही थी ।

उस वक़्त, दीवारे शहर में
ना रंगीन थी ना सादी,
एक ही रंग में नज़र आ रही थी ।
ये चाँद की चाह मुझे,
हर गली के चक्कर लगवाने  की,
साज़िश में नज़र आ रही थी ।

खिड़की से देखकर, 
इश्क़ की आहट को,
मेरा मन रास्ते पर 
उसे ढूँढने निकल जाता है,
और जब पास पहुँचता हैं,
तो छूकर, इश्क़ को, जल जाता हैं ।

-रोशन कुमार “राही”