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Tuesday, October 11, 2016

अंतहीन सफ़र

अंतहीन सफ़र में इक परिंदा क्या चाहता है
क्या मिलता हैं चलते-चलते
कुछ ऎसे ही सवाल कांधे पर लेके
वो परिंदा कुछ दूर तक चलना चाहता हैं ।

पुछता हैं लोग इश्क़ क़रतें क्यूँ हैं??
क्या हर कोई इस दुनियाँ में जलना चाहता है??
उसे क्या मालूम आसमाँ का रंग 
किसी की मुस्कराहट जैसा हैं ।
वो परिंदा है फिर भी, 
इश्क़ समझने की खातिर
वो जमीं पर चलना चाहता हैं ।
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वक़्त गुजर गया है अब, 
उस परिँदे के दिल में भी कोई रहता है ।।
वो बस उस सख्श से मिलना चाहता है 

अब हजार कोशिशें  जाया चली गयी है
मिलने की, मुहब्बत से ।
अब नहीँ मालूम उसको की क्या रह गया है 
हासिल करने को,
अब बस इश्क़ उसकी मंजिल है
वो बस इश्क़ की राह पर चलना चाहता हैं 

इक लम्हा ऐसा आता हैं।
जब दिल उसका जलता है,
ख़ालीपन की आग में ।
और वो अब बस मुस्कराता हैं 
और जलना चाहता हैं ।

अब मालूम हैं उसको 
जिंदगी में मंजिल हर किसी को नहीँ मिलती
चलते रहने में सुकूँ हैं
वो अब सुकूँ की तलाश में 
बस चलते रहना चाहता हैं

रोशन कुमार "राही"