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Sunday, September 25, 2016

मंजिल

मेरें तन्हा मन की आँखों में
मिल जाओ तुम
कभी नमी, कभी रौशनी बनकर,
मुझसे मिलने आओं तुम ।

हर पल, मेरी आँखों में निशाँ हों 
तेरी मुस्कुराहट का,
मेरी यादों में जब आओ तुम
मेरी बनकर आओ तुम ।

क़ोई सरहद, कोई मंजिल 
जो दूर तुझे ले जाये,
बागों में मेरे, फुलों की तरह
मिल जाओ तुम ।

जब भी इश्क़ की बात आती हैं
दिल तेरे घर ले जाता हैं
अब बस मेरा निशाँ हों, तेरा निशाँ हो
और एक वक़्त हमारा हो,
मेरे इश्क़ की राहों में 
बस मंजिल बन जाओ तुम ।
मेरें तन्हा मन की आँखों में
मिल जाओ तुम ।

  रोशन कुमार "राही"