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Tuesday, June 28, 2016

ख़्वाब


अधूरेपन की दहलीजों पर 
तेरी बातें अक्सर आती हैँ
खामोश पड़े इक राही को
चलने को उकसाती हैं ।

मेरा जहाँ इक कमरा हैं 
जहा अंधियारें रोशन रहते हैं
और कमरे के चौखट पे
तेरी बातें दीप नये जलातीं है ।
खिड़की से वो राहें दिखतीं हैं
जो तुझे मुझसे दूर ले जाती हैं।
कभी-कभी बस चलते-चलते
तू दूर बहुत चली जाती हैं 
मेरी सांसे मद्धम चलतीं हैं
तेरी आहट गुम हों जाती हैं ।

दूर देश की कोई हवा तुझसे मिलकर
दरवाज़े से अंदर आती हैं
झोली भर के ख़्वाब बुरे से
मेरे कमरे में राख जाती हैं 
तब इत्तेला होती हैं की
कितना अधुरां हूँ मै ।

फिर,
मेरे अधूरेपन की दहलीजों पर 
तेरी बातें अक्सर आती हैँ
ख़ामोश पडे एक राही को
चलने को उकसाती हैं 

फिर से,
तेरी बाते मेरे कमरे की चौखट पे
दीप नये जलाती हैं ।


-रोशन कुमार "राही"