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Monday, April 11, 2016

दिया

जब मै जिन्दगी के गहरे अंधेरों से देखता हू, तो दूर कही, एक मुकाम पर वो मुझे जलते दिए की तरह दिखती हैं ।


अंधेरों की शह पे बढती 
रूह मेरी चलती जाती हैं
तू है एक मिट्टी का दिया 
मंजिल की तरह दिखती है 
और दिल में कही जलती रहती है ।

क्यूँ न कहे दिल अपना तुझे
मेरे जेहन में तेरी परछाई 
हर रोज चिरागों सी जलती रहती हैं ।

न जाने कब तक जलती रहेगी 
तेरी तस्वीर मेरे दिल में 
न जाने कब तक तेरी मुस्कुराहट
मुझे रास्ते दिखलायेगी

तुझको पाने की कोशिश में
अंधेरों की शह पे बढती 
रूह मेरी चलती जाती हैं ।

अब दिल जल भी जाये तो अफ़सोस नहीं
जलते दिये से मिलने की 
चाह मेरी बढ़ती जाती है ।

कोरे पन्नों की धड़कन पे 
जब स्याही लिखती है नाम  तेरा 
दूर कही मन को रोशन सा 
एक मिट्टी का दिया
मंजिल की तरह दिखायी देता हैं
और दिल में कही जलता रहता है

-रोशन कुमार "राही"