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Thursday, February 18, 2016

कागज और स्याही

उस बंद किताब ने फिर बुलाया है 
उस सूखे गुलाब ने फिर पुकारा है 
उन ग़ज़लों और उस स्याही 
ने हमें फिर पुकारा है 
इस दिल की तबाही ने हमें 
फिर पुकारा है 

कोरे कागज ने कहा है स्याही से, 
फिर से मुहब्बत हो गयी है तुमसे 
स्याही कहती है 
कितना बेरंग अक्स तुम्हारा है 
तुम जैसे कइयों ने मुझे पुकारा है 

जरा सा दिल में तो पनाह दो 
कोई आग दिल में फिर से तुम लगा दो 
मुहब्बत न करो, बस ख्वाब दिखा दो 

हम वो है जिसके वजूद को 
मंजिल तुमने दी है 
आज भी रोता हूँ 
कि हम वो कागज है 
जिसके सीने पर, इक जालिम ने 
कलम छोड़ दी है 

उन सुखी पत्तियों ने जो 
जख्म लिखे है, मेरे दामन पे 
उन महकती बहारों ने मुझे 
फिर से पुकारा है 

हम तो कागज है, उस मुकाम के 
ऐ "राही" ऐ "साहिल" ऐ स्याही 
जहा सिर्फ तू ही इमान हमारा है 

उस बंद किताब ने फिर बुलाया है 
उस सूखे गुलाब ने फिर पुकारा है 

Written by -
-रोशन कुमार "राहीं  & भावेश