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Monday, August 31, 2015

"इश्क़ ".….... इक राहीं का सफ़र

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उसकी दुनियाँ  से आते हुये 
बेफिक्र, अपनी शज़र को जाते हुये 
मेरा वजूद उसकी यादों में खोया रहता है 
और अक्सर मैं राह भटक जाता हूँ 

दूर तक फ़ैली वीरानी से 
पूछता हूँ अपने रस्ते की दिशा 
और चाँद कहता है कि 
ऐसे सिरफिरों पे मैं मुस्कुराता हूँ 

चाँद को कहता हूँ मैं 
की मुहब्बत है मुझे
फिर वो कहता है कि 
रुक मैं तुझे तेरी राह बताता हूँ  
कूछ दूर तू मेरा पीछा कर 
कूछ दूर तू साथ चल मेरे 
नजर आएगी तुझे तेरी मंजिल वहा 
जहा हर बार मैं तुझे ले जाता हूँ 

aur fir jab Rahi manjil pe phoch jata hai to wo chand se kehta hai ki...

ऐ चाँद, जो कभी वो मुझे ढूंढे तो बताना उसको 
की हर बार मैं इसी रस्ते से जाता हूँ 
उसे बताना की इतनी मुहब्बत है उससे 
की मैं उसकी यादो में गुम रहता हूँ  
और अक्सर राह भटक जाता हूँ. 

                                                       -रोशन कुमार "राही"