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Tuesday, August 25, 2015

इक गीत

Once a friend came to me and asked me to write a song for her and her boyfriend. normally i find my self unable to write on such demands because poetry is something that comes to me  all by itself i have never forced my self to complete a poetry, and there is no  fixed time when any poetry will come to me, i have penned many poetry when i was on WC(water closet" (flush toilet)). 
But my friend's desire for a poetry was pen-able so i wrote this. 

कहीं ढल जाये सूरज  और 
हवाओं में इक गीत तेरा मेरा हों 
ये बादल बरसें मुझपर झूम कर 
और बूंदों में हर रंग तेरा हो 

तू मिल जाए मुझे 
मुकद्दर की लकीरों में 
हर दिन तेरी बाँहों में एक नया सवेरा हो 
लिख दे एक गीत इक दुनिया ऐ "राही" 
जिसमे मै  उसकी हूँ और वो मेरा है 

बस कहीं ढल जाये सूरज 
और मेरा मन पंछी की तरह 
उड़ जाये साथ तेरे 
और हवाओं में एक गीत तेरा मेरा हो 

कुछ  ऐसे देख मेरी आँखों में की 
ये दुनिया धुंधली पद जाये 
तू ऐसे रस्ते बुन जिनपे 
जिंदगी जैसा एक सफर तेरा मेरा हो 

एक ऐसी मंजिल पे ले चल 
जहां हर शाम हवाएं गीत गुनगुनाती हो 
और वो गीत तेरा मेरा हो. 

बस ले चल  कहीं दूर 
जहां सूरज ढल जाये और 
हवाओं में इक गीत तेरा मेरा हो 

 -रोशन कुमार "राही"