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Wednesday, June 18, 2014

इक उम्र आसाँ हो गयी

एक वक़्त  में इतनी मुश्किलें आई
इक जिंदगी बदल गयी
इक उम्र  आसाँ हो गयी

मालूम हुई जब हकीक़त दिल को
की सुबह में भी शाम से अँधेरे है
कुछ मंजिलें सवर गयी
कुछ राहें बदल गयी

जो चिराग बुझा कर  मैंने
सुलगते पैमानों के
मुश्किलें बिखर गयी
मंजिलें आसाँ हो गयी

जाम-ए -तवज्जों  में होंठों से
जहर के पुलिंदे लगा कर देखा
आँखें मेरी  खुल गयी
इक उम्र आसाँ हो गयी

वक़्त के मुंडेर से देखा दुनिया को
मेरी शामें रौशन हुई
इक तमन्ना सी जिंदगी सी जिंदगी गयी

कुछ किरणे निकल गयी रौशनी देकर
कुछ उम्रे निकल गयी दुआएं देकर
इक ख्वाब के जायके को होंठों से लगाया
कुछ ख़ाहिशें बदल गयी
कुछ जिंदगी आसाँ हो गयी

मैंने मर के देखा यहां पर
कुछ लकीरें बदल गयी
कुछ शोहरतें नादान हो गयी

कुछ  आसरे से बुझ गए
कुछ नई उमीदें रौशन हुवी

                                    -रोशन