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Friday, September 6, 2013

शेहतीरें



एक आइना मेहरूम है आपने तकदीर की  लकीरों से
एक चाहत हर पल जली  है लौ में शेहतीरों से

चाहतें है पंखो पंखों में आसमा  छूने की अबभी
लहरों की कशिश उलझी है
मेरी पतवार से अब भी
वो शायर तेरे शेहेर को आया था
एक रौशनी खाक हूई दिल की दीवारों में तब भी
की अब वो मशरूफ है
किसी की मुशकूराहट भरी लकीरों में
मैहकदों में जली है चाहत पैमानों  की तस्वीरों से
की एक जिंदगी मेहरूम है तेरे चाहत भरे सवालों  से
एक  रात हर लम्हा  जली  है मेरे अश्कों के उजालों से
एक आइना मेहरूम  है  आपने तकदीर की  लकीरों से
एक चाहत हर पल जली  है लौ में शेहतीरों से


चाहत हूई तेरे  इश्क़ में आसमा छूने की जब भी
तेरी ख्वाहिश  जुदा रेहने की चुभती है अब भी
तेरे इश्क में डूबकर मैंने खुद को पाया है
तुझे देखने फिर से वो आशिक तेरे शेहेर आया है
शोहरत मशरूफ रही है तेरी रौशन उजालो में
नजरे देखती है  तुझको चाहत के प्यालों में
एक नाजिनी  महरूम है मेरे कतरों और सवालों से
कोई हसरत हर पल जली है अंधेरों में ख्यालो से
कल की शाम अपने नाम सा रौशन हू मै
ढूंढता मुझको तेरी गलियों से
मेरी कब्र तक है तेरा काफिला आया
की तेरे इश्क में डूबकर मैंने है खुद को पाया

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