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Friday, November 2, 2012

“तेरी यादें”

एक इंतज़ार का रहनूमा छोड़ जाती हैं
तेरी यादें ।
वक़्त की बिखरीं ख़ामोशियों में 
एक नयी सदा के निशाँ छोड़ जाती हैं 
तेरी यादें ।


तू है या नहीं, इस वहम में,
मुझे मुझसे ही दूर ले जाती है,
तेरी यादें ।
रह-रह के ज़ेहन में सिलवटें उठती है,
इन तनहाइयों का सबब दे जाती है,
तेरी यादें ।

ख़ामोश हूँ अब भी,
इन पुलिंदों की तामील में अब भी,
कुछ स्याहियों सी मचलउठतीं हैं,
इन पन्नो पर तेरी यादें ।

हर दफ़ा की तरह वही अर्ज़ हैं
मेरे लव्ज़ों पर,
इक ख़ुदगर्ज़ सा अहसास 
छोड़ जातीहै तेरी यादें  ।
वक़्त बेवक्त परेशान हूँ मैं ज़िंदगी में 
मन में, इक जीने की 
वजह छोड़ जाती हैं तेरी यादें ।

लहरों तले जीना आदत हैं समन्दर की,
मेरे जिस्म में तूफ़ान के निशाँ छोड़ जाती है 
तेरी यादें ।
जब भी मिलता हूँ महक़दों में तुझसे
इन लवों पे कुछ सिलवटें छोड़ जाती हैं
तेरी यादें ।

ये रात गुज़रने पर आयेंगी तूँ
इस क़ब्र पे ऐसी ही उम्मीद की 
रोशनी छोड़ जाती हैं, तेरी यादें ।
कुछ पल मेरी हसरतों के छोड़ जाती है तेरी यादें ।

इस क़ब्र-ए-गुलिस्ताँ से क्या फ़िक्र करूँ तेरी 
कुछ कश-म-कश भरी रातें छोड़ जाती हैं,
ये तेरी आहट भरी तेरी यादें ।

इस दो गज़ की ज़मीं पर दो फ़ूल खिलें हैं,
इनकी महक में, इक तूफ़ान सी,
सुलग जाती हैं तेरी यादें ।

- रोशन यादव