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Thursday, November 1, 2012

“मेरी हमसफ़र, मेरी हैरत“


कोरे काग़ज़ की सिलवटों पे,
एक शाम लिखकर तन्हाइयों से जलाया है
आज तो पैमानों की बंदिश ने भी,
हदों के पार तक पिलाया है ।
धड़कनों पे लिखकर नाम उसका
कश-म-कश से जलाया है ।

इक तपिश ने नाम ले कर उसका
                                                          महक़दों की दहलीज़ तक सताया है ।
पहलू की पहली किरन से लेकर
अंधेरो की आख़िरी बूँद तक,
तेरा हमसफ़र बनने की ख़्वाहिश में जिया 
वक़्त की आग ने इन ख़यालों को 
चुन-चुन कर जलाया है ।

इक वक़्त की तामील में, 
पैमाने लिये महक़दे पहुँचा,
शाकी  ने हैरत से कहा, कोई नया ज़ालिम 
फिर से टूट कर आया

- रोशन यादव